
इन प्रचलित श्लोकों का सोशल मीडिया पर इतना बेहूदा और विकृत अर्थ देखकर मेरी तो गीता से ही अरुचि हो गई थी। ये किताब मेरी एक दोस्त ने मुझे गिफ्ट की थी और इसने तो बाज़ी ही पलट दी। गीता से प्यार करना सिखा दिया। सच में, गीता के नाम पर क्या-क्या चल रहा है! और असली गीता क्या कहती है, ये किताब पढ़कर पहली बार समझ आया। संस्था को ये पुस्तक लाने के लिए बहुत धन्यवाद।

पारुल जी, सोशल मीडिया की विकृत व्याख्याओं से जो अरुचि हो गई थी, वो प्यार में बदल गई, ये बात ही अपने आप में बहुत कुछ कहती है। जो चीज़ नकली सिक्कों की वजह से बेकार लग रही थी, वही असली रूप में सामने आने पर दिल जीत ले, यही तो असली चीज़ की पहचान है। संस्था तक ये बात पहुंचे, अच्छा लगेगा। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें।