
हम सोचते हैं कि अधर्म बढ़ेगा तो कोई बाहर से आकर उसे मिटा देगा। यह किताब उसी भ्रम को तोड़ती है। आचार्य प्रशांत गीता के श्लोक 4.7–4.11 को वेदांत के प्रकाश में खोलते हैं, कृष्ण बाहर से नहीं, आपके ही भीतर से प्रकट होते हैं, और वह आपके अपने चुनाव और ज़िम्मेदारी पर टिका है। व्याख्या सरल है पर सोच को झकझोरती है। जिन्होंने इन श्लोकों का विकृत अर्थ सुनकर गीता से दूरी बना ली है, उनके लिए यह नज़रिया ही बदल द...