हरि भीतर ही प्रकटेंगे अभी , यदि स्वयं से तुम युद्ध करो।
कोई नहीं है बाहर; तुम्हारा जीवन, तुम्हारी ज़िम्मेदारी, तुम्हारा चुनाव। तुम चाहो तो कृष्ण प्रकट होंगे, लेकिन बाहर से नहीं, तुम्हारे ही भीतर से। किसी बाहरवाले की प्रतीक्षा करने का एक ही कारण है - बाहरी और आंतरिक, दोनों रूप से सही ज्ञान का अभाव।