
“यदा यदा हि धर्मस्य…” मैं भी हमेशा यही समझता था कि जब अधर्म बढ़ेगा, तब कृष्ण आएँगे और सब ठीक करेंगे। इस पुस्तक ने पहली बार इस श्लोक को मेरे लिए पूरी तरह उलट दिया। बात किसी बाहर से आने वाले कृष्ण की नहीं, बल्कि मेरे अपने जीवन की ज़िम्मेदारी की है। अधर्म सामने हो और फिर भी मैं उसे देख न पाऊँ, तो समस्या केवल दुनिया में नहीं, मेरे भीतर के अज्ञान में भी है। आचार्य जी इन श्लोकों को ऐसा अर्थ देते हैं ...