
जब हम हमारे अधूरेपन को नहीं जानते कि बो आ कहा से रहा हे तो हम सब अधूरा पकड़ लाते हे जीवन में हमारे संपूर्ण चुनाव बाहरी होते समय समाज संयोग के हमारा मौलिक चुनाव कुछ नहीं है।सबसे पहले हम कौन हे । ओर चाहिए क्या ?

विष्णु कांत जी, यही तो देखने वाली बात है - अधूरापन कहाँ से आ रहा है, यह पूछते ही आप ठीक जगह पहुँच गए हैं। पर ध्यान दीजिए, आपने जो लिखा उसमें एक चाल है: "हमारे सारे चुनाव बाहरी हैं, मौलिक कुछ नहीं" कहकर आप खुद को निर्दोष बना रहे हैं, जैसे चुनने वाला कोई है ही नहीं, बस समाज और संयोग हैं। सच यह है कि समाज और संयोग सामग्री देते हैं, पर उस सामग्री को "मैं यह हूँ" बनाकर पकड़ना किसी और का काम नहीं, आपका...