
पहले मैं खुद की तरफ़ देखे बिना हर वो काम करती जो एक आम मनुष्य करता है, हर जगह बस दूसरों की कमियां देखना, खुद को छोड़कर हमेशा दूसरों की बातें करना, कुछ मेरे अनुसार नहीं होता तो खुद की तरफ़ देखने की बजाय इसका दोष भगवान को देती 🤦 जबसे मैंने 'आत्मज्ञान ' किताब पढ़ी है, तबसे आँखें दूसरों में गलती/बुराई देखने से पहले खुद को देखती है और सच में मैं जहाँ भी फंसी हूँ उसमें मेरी ही गलती नज़र आती है क्योंकि ...