
मैंने ऐसे कईं विषयों से दिल लगाया जिनके बदल जाने पर मानों मुझे आसमान से गिरा दिया हो : चाहे मेरे खेत खलिआन, मेरे गांव के वो स्थान जहाँ मैंने बचपन बिताया; जिन दोस्तों के साथ रहा और उसके बाद सेना की नौकरी और फिर वहाँ से भी विदाई। पूरा का पूरा दर्द का भारी सैलाब समेटे हुए एक ऐसी पीड़ा के साथ जी रहा था जो किसी से कही नहीं जा सकती। लेकिन फिर भी उम्मीद नहीं टूट रही थी।तब आचार्य जी जीवन में आए नहीं थे तो और दूसरी चीजों को इकट्ठी करके उस खालीपन को भरने की कोशिश कर रहा था। उस समय तो मैं व्यक्तिगत पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी मानता था, क्षणभंगुरता के वास्तविक मतलब को नहीं समझता था। ऐसे सोचता था कि एक दिन ये शरीर मिट जाएगा, बस इतना ही मतलब समझता था क्षणभंगुरता का। लेकिन अब जब भी कोई सिर चढ़कर बोलता है तो आचार्य जी की कोई बात याद आ जाती है और हंसी छूट जाती है। और मन ही मन कहता हूँ — चल भक्क!😄



















