Atul kumarहम दूसरे रास्ते खोजते हैं लेकिन फिर आस-पास का माहौल देखकर बदलने के बजाय और स्थिर हो जाते हैं और हमारा चुनाव खुद से नहीं बल्कि पुरानी मा…
अतुल जी, जो आपने देखा वह सटीक है — चुनाव अक्सर खुद से नहीं, पुरानी मान्यताओं से उठता है, और आलस उसी वजह से अच्छा भी लगने लगता है। यह ईमानदार पकड़ है। लेकिन एक बात पर ठहरकर देखिए। क्या किताबें न पढ़ पाना सच में कारण है, या यह भी एक सुविधाजनक व्याख्या है? क्योंकि ललिता जी के सामने कोई दर्शन की किताब नहीं थी जिसने उन्हें रास्ता दिखाया, परिस्थिति ने ही पूछा और उन्होंने जवाब दिया। जो स्थिर हो जाना है, वह ज्ञान की कमी से नहीं, उस कीमत से डरने से होता है जो नया रास्ता चुनने पर चुकानी पड़ती। किताबें, दर्शन, साहित्य — ये सब उस डर को ढकने के और बहाने भर न बन जाएँ, यह देखना ज़रूरी है। अभी आपके सामने कौन-सी परिस्थिति है जिसमें आप यह जानते हुए भी रुके हुए हैं कि एक दूसरा रास्ता संभव है?


















