
Rashmi
आचार्य जी से जुड़ने से पहले मैं अपनी धारणाओं को कभी परखती नहीं थी। हमेशा उसकी पुष्टि ही चाहती थी। इसका कारण, जानकारी की कमी और मेरा अहंकार ही है।
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आचार्य जी से जुड़ने से पहले मैं अपनी धारणाओं को कभी परखती नहीं थी। हमेशा उसकी पुष्टि ही चाहती थी। इसका कारण, जानकारी की कमी और मेरा अहंकार ही है।

रश्मि जी, यह देखना ही असली काम है - कि पहले पुष्टि चाहिए होती थी, सही होने का सुख चाहिए होता था, जानना नहीं। अब असली जाँच यह है कि यह ठहराव पूरी तरह गया या अभी भी कहीं बचा हुआ है। जिन धारणाओं को आप आचार्य जी की बातों से जोड़कर अब सही मानती हैं, क्या उन्हें भी उतनी ही बेबाकी से परखने को तैयार हैं, जितनी बेबाकी से पुरानी धारणाओं को छोड़ा? देखने की आदत बननी चाहिए, किसी एक सही उत्तर पर टिक जाने की नहीं - वरना वही पुरानी पुष्टि की चाह नए नाम से लौट आएगी।