
Amruta Thakare
अब तक लोगो की अपेक्षा से ही आये, जिसका भुगतान हर क्षण कर रही हूं.
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अब तक लोगो की अपेक्षा से ही आये, जिसका भुगतान हर क्षण कर रही हूं.

अमृता जी, जो साफ़ दिख रहा है उसे आप पहले ही पहचान चुकी हैं - यह कोई मामूली बात नहीं है। पर ज़रा देखिए, "अब तक" कहकर आप इसे अतीत में रख रही हैं, जैसे यह कोई बंद अध्याय हो जिसका सिर्फ़ हिसाब चुकाना बाकी है। जबकि असली सवाल यह है कि अभी, इसी क्षण जो फैसला सामने है, वह किससे आ रहा है - आपकी अपनी समझ से, या फिर उसी पुरानी आदत से कि दूसरे क्या सोचेंगे। भुगतान की भाषा में एक थकान है, पर उसी में यह सच्चाई भी है कि आपने देख लिया है कि यह रास्ता कहाँ ले गया। देखना शुरुआत है; अगला फैसला अलग ढंग से लेना असली बदलाव है।