
✍🏻 पोस्ट 16 | 1 अक्टूबर '26 💭 विषय — राजव्यवस्था और प्रशासन ──────────── 🏛️ यूपीएससी के 100 साल: एक परीक्षा या इससे कहीं ज्यादा? हम यूपीएससी को अक्सर एक बेहद कठिन परीक्षा के रूप में जानते हैं। लेकिन संविधान ने इसे सिर्फ परीक्षा करवाने के लिए नहीं बनाया था। 📜 आज यूपीएससी के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1 अक्टूबर 1926 को भारत के पहले पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना हुई थी। आज संविधान का अनुच्छेद 315 संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों का प्रावधान करता है। ⚖️ यूपीएससी भर्ती के लिए परीक्षाएँ आयोजित करने के साथ नियुक्ति, पदोन्नति और कुछ अनुशासनात्मक मामलों में भी परामर्श देता है। इसके सदस्यों के कार्यकाल और हटाने जैसी चीजों के लिए भी संविधान में विशेष प्रावधान हैं, ताकि लोक सेवाओं में भर्ती की प्रक्रिया राजनीतिक कार्यपालिका के सीधे नियंत्रण से पर्याप्त दूरी पर रह सके। यानी लोकतंत्र केवल अच्छे अधिकारियों की उम्मीद पर नहीं चलता। वह ऐसी संस्थाएँ भी बनाता है जो व्यवस्था को किसी एक व्यक्ति या सरकार की इच्छा पर कम निर्भर रखें। हर वर्ष लगभग 10 लाख अभ्यर्थी UPSC सिविल सेवा परीक्षा में आवेदन देते हैं, जिनमें से लगभग 1,000 अभ्यर्थियों का अंतिम रूप से चयन होता है। इस प्रकार, परीक्षा की अंतिम सफलता दर लगभग 0.1% रहती है। इतनी कम सफलता दर के कारण इस परीक्षा के अभ्यर्थियों को लेकर समय-समय पर सवाल और संदेह भी सामने आते रहे हैं। 🧑💼 आखिर इन सेवाओं में चुने गए लोगों पर नीतियों को जमीन पर लागू करने, सार्वजनिक संसाधनों को संभालने और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने जैसी बड़ी जिम्मेदारियाँ आती हैं। 🪞 लेकिन जिस पद के लिए इतनी सावधानी से चयन होता है, हम उस पद को चाहते क्यों हैं? क्या आकर्षण उस जिम्मेदारी का है, जिसमें अपना समय और क्षमता सार्वजनिक हित में लगानी है? या उस अधिकार, प्रतिष्ठा और पहचान का, जो पद के साथ मिलती है? किसी पद की शक्ति चाहना और उस पद की जिम्मेदारी चाहना एक ही बात नहीं है। पद जितना बड़ा हो, यह देखना उतना ही जरूरी है कि हमें उसके काम से लगाव है या उससे अपने बारे में मिलने वाली ऊँची छवि से। यह प्रश्न केवल यूपीएससी तक सीमित नहीं है। हम नेतृत्व और अधिकार तो चाहते हैं, लेकिन क्या उनके साथ आने वाली जवाबदेही, कठिन फैसले और सेवा का भार भी उतनी ही इच्छा से चाहते हैं? ❓ जिस जिम्मेदारी के साथ कोई प्रतिष्ठा न मिले, क्या आप उसे फिर भी उतनी ही इच्छा से चुनेंगे? 🔗 स्रोत: https://indianexpress.com/article/education/upsc-turns-100-commission-pushes-exam-reforms-to-assess-reasoning-spontaneous-thinking-10901853/
















































