
भीतर की चेतना और सत्य की खोज: एक आत्म-चिंतन मैं खुद को ऐसा देखना चाहता हूँ और हर पल इस बात को गहराई से महसूस करता हूँ कि मेरे भीतर आखिर कौन बैठा है? इस चेतना को समझना, खुद से लगातार सवाल करना और अपने भीतर झाँकना क्या बाहरी दुनिया को देखने का नज़रिया बदल सकता है? यदि इसका उत्तर 'हाँ' है, तो क्या हमें खुद को उस परम चेतना से जोड़कर हर सत्य की तलाश नहीं करनी चाहिए? उसे ढूँढना और अपने जीवन में उतारना चाहिए? मैंने यही सीखा है कि यदि कोई गलत बात बोले, तो उसका आक्रामक विरोध करने के बजाय, अपनी बात को बहुत ही सरल, शांत और स्पष्ट तरीके से रखना चाहिए। आचार्य जी, मेरा आपसे करबद्ध निवेदन है कि कृपया मेरे इस सवाल का मार्गदर्शन करें—क्या यह मार्ग और यह चेतना का अनुभव ही सत्य है? यदि हाँ, तो इस वैचारिक यात्रा की सही प्रतिक्रिया और दिशा क्या होनी चाहिए?



















