
बोधकार्य 25 सितंबर, 2026 1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने वाले 50 शब्द और उनमें सकारात्मक शब्द वेदांत में सत्य को सीधे किसी वस्तु की तरह परिभाषित करने के बजाय अनेक बार संकेतों, निषेधों और पारमार्थिक संज्ञाओं के माध्यम से बताया गया है। 50 शब्द 1. ब्रह्म 2. आत्मा 3. आत्मन् 4. सत्य 5. सत् 6. चित् 7. आनंद 8. सच्चिदानंद 9. अद्वैत 10. अव्यय 11. अविनाशी 12. अक्षर 13. निराकार 14. निर्गुण 15. निरुपाधिक 16. निरंजन 17. निरपेक्ष 18. पूर्ण 19. अनंत 20. नित्य 21. शुद्ध 22. बुद्ध 23. मुक्त 24. कैवल्य 25. मोक्ष 26. तुरीय 27. साक्षी 28. द्रष्टा 29. पुरुष 30. परमात्मा 31. परम 32. परब्रह्म 33. कूटस्थ 34. अकर्ता 35. अभोक्ता 36. असंग 37. अचल 38. शांत 39. स्वयंज्योति 40. ज्योति 41. चैतन्य 42. प्रज्ञान 43. ऋत 44. अमृत 45. निर्भय 46. निरुपाधिक 47. अज 48. अनादि 49. नेति 50. नेति-नेति सकारात्मक भाषा वाले हैं—जैसे सत्, चित्, आनंद, पूर्ण, अनंत, नित्य, शुद्ध, मुक्त, अमृत, ज्योति, चैतन्य आदि। इन शब्दों को भी अंतिम सत्य का वर्णन समझ लेना वेदांत की दृष्टि से समस्या पैदा कर सकता है। “अनंत”, “पूर्ण” या “आनंद” सुनकर अहंकार इनके बारे में एक मानसिक तस्वीर बना सकता है। इसी कारण उपनिषद् की “नेति-नेति” परंपरा सकारात्मक वर्णन से आगे जाकर हर सीमित धारणा का निषेध करती है। अर्थात् प्रश्न केवल यह नहीं है कि “सत्य क्या है?” बल्कि यह भी है कि “जिसे मैं सत्य समझकर पकड़े बैठा हूँ, वह क्या नहीं है?” 2. सत्य की बात करते समय मेरी भाषा नकार की होगी या सकारात्मकता की? शुरुआत नकार से करना है, क्योंकि सकारात्मक भाषा बहुत जल्दी सत्य को एक वस्तु, अवस्था या उपलब्धि बना देती है। जैसे ही मैं कहता हूँ—“सत्य आनंद है”, “सत्य प्रकाश है”, “सत्य पूर्णता है”—मन तुरंत पूछने लगता है: वह आनंद कैसा होगा? वह अवस्था मुझे कब मिलेगी? मैं उसे कैसे प्राप्त करूँ? इस तरह सत्य फिर से मेरी इच्छा का विषय बन जाता है। इसके विपरीत “नेति-नेति” मुझसे कुछ नया पकड़ने को नहीं कहता। वह मेरे सामने यह देखने की माँग रखता है कि जिसे मैं “मैं”, “मेरा”, “सुख”, “सफलता”, “ज्ञान” या “सत्य” मानकर बैठा हूँ, उसमें क्या-क्या असत्य मिला हुआ है। इसलिए सत्य की दिशा में भाषा कुछ ऐसी होगी: यह नहीं। यह भी नहीं। यह पहचान भी नहीं। यह उपलब्धि भी नहीं। यह मानसिक तस्वीर भी नहीं। यह अहंकार की बनाई हुई मंज़िल भी नहीं। नकार का उद्देश्य मुझे खाली छोड़ना नहीं, बल्कि झूठे सहारों से मुक्त करना है। सकारात्मकता बाद में आए भी तो वह किसी नई धारणा को पकड़ने के लिए नहीं, बल्कि उस खालीपन में जो वास्तविक है उसे देखने के लिए आए।



















