
❓ लेकिन एक क्षण रुककर देखिए: जिस व्यक्ति से मेरा विवाद है, उसे छोटा करने के लिए मुझे किसी स्त्री को बीच में लाने की जरूरत क्यों पड़ती है? उत्तर:— मैंने कभी खुलकर गाली नहीं दी, पर कभी कभी मन में देते थे, पर मुझे जरूरत नहीं पड़ती थी, लेकिन शुरू से ही आसपास के लोगों से सुनकर वही भीतर समा गई थी, पर गाली अभी भी मेरे मन में शब्दस है पर अब समझने लगे है कि गाली से किसी स्त्री के युवनांगो से ही क्यों? गाली से ही पता चलता है कि, उस व्यक्ति के मन वासना ही है, वो भोगी और हवसी ज्यादा है नहीं तो झगड़े में, गाली ही क्यों और उसमें भी विशेष स्री ही क्यों? क्योंकि हमनें स्त्री को इंसान नहीं देह ज़्यादा देखा और समझा, एक उत्पाद के रूप में, एक वासना के रूप में। जब भीतर बोध होता है तो बाहर करुणा होती है, तो स्त्री भी इंसान दिखने लगती है।



















