
आदरणीय आचार्य प्रशांतजी, सादर प्रणाम! आपकी शिक्षाओं ने मुझे जीवन को देखने का एक बिल्कुल नया दृष्टिकोण दिया है। पहले शायद मैं जीवन जीने के बजाय उसे परिस्थितियों, जिम्मेदारियों और लोगों की अपेक्षाओं के बीच गुजार रही थी; लेकिन आज मैंने स्वयं के लिए जीना सीख लिया है। आज 37 वर्ष की उम्र में भी मैंने अपने सपनों को नई उड़ान देने का साहस जुटाया है। 17 वर्षों के शिक्षा के अंतराल के बाद दोबारा महाविद्यालय में प्रवेश लेकर समाजकार्य मास्टर ऑफ सोशल वर्क की पढ़ाई पूरी कर रही हू । संगीत सीखना शुरू किया, स्विमिंग सीखी और अब साइकिल चलाना भी अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है। आज मैं प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर साइकिल चलाने का प्रयास कर रही हूँ। कभी जिन रास्तों पर चलने की कल्पना से भी डर लगता था, आज उन्हीं रास्तों पर पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही हूँ. यह सब केवल शारीरिक साहस की बात नहीं है, बल्कि मेरे भीतर आए वैचारिक परिवर्तन का परिणाम है। आपके विचारों ने मुझे स्वयं को समझना, अपनी क्षमताओं को पहचानना और जीवन को अपनी शर्तों पर सार्थक बनाना सिखाया है। आचार्यजी, आपने मुझे किसी पर निर्भर होकर जीना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर की शक्ति को पहचानकर जीना सिखाया है। आपकी शिक्षाओं ने मेरे भीतर वह साहस जगाया है, जिसकी बदौलत आज मैं उम्र, परिस्थितियों और सामाजिक धारणाओं की सीमाओं को चुनौती देने का प्रयास कर रही हूँ। मेरे जीवन में आए इस सकारात्मक परिवर्तन के लिए आपके प्रति हृदय से आभार, धन्यवाद और असीम कृतज्ञता! सादर, वर्षाराणी गायकवाड़🙏















































