
महिलाओं की बेड़ियाँ टूटेंगी, तभी पुरुषों की बेड़ियाँ भी टूटेंगी, क्योंकि एक की कैद से दूसरा भी कहाँ आज़ाद रहता है। आधी आबादी को पीछे रखकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता, स्त्री के पंख बाँधकर मानवता आकाश नहीं छू सकती। स्त्री पीछे होगी, तो पुरुष की उड़ान भी अधूरी होगी, राष्ट्र की प्रगति भी अधूरी होगी, और दुनिया की विकास-यात्रा भी अधूरी होगी। स्त्री को सिर्फ़ स्त्री मत जानो वह पहले एक मनुष्य है, उसके सपनों का भी आकाश है, उसके जीवन का भी एक उद्देश्य है। वह देह नहीं, सिर्फ़ किसी रिश्ते की पहचान नहीं, वह एक चेतना है, एक संभावना है, एक सम्पूर्ण मनुष्य है। उसे अपनी देह का कटघरा मत बनने दो, उसे अपने भीतर की ऊँचाइयाँ छूने दो। क्योंकि जब एक स्त्री अपने भीतर की बेड़ियाँ तोड़ती है, तो सिर्फ़ उसका जीवन नहीं बदलता एक घर बदलता है, एक समाज बदलता है, एक राष्ट्र बदलता है, और मानवता आगे बढ़ती है। स्त्री की मुक्ति स्त्री की ही नहीं हम सबकी मुक्ति है।


































