
✍🏻 पोस्ट 10 | 19 सितंबर '26 💭 विषय — विश्व दर्शन ────────── 📖 एक मुगल राजकुमार ने उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद क्यों कराया? 🏛️ 17वीं शताब्दी में मुगल सम्राट शाहजहाँ के बड़े बेटे दारा शिकोह को राजगद्दी का प्रमुख दावेदार माना जाता था। लेकिन उनकी रुचि केवल शासन और राजनीति में नहीं, बल्कि दर्शन और विभिन्न धार्मिक परंपराओं को समझने में भी थी। 📚 दारा शिकोह सूफ़ी विचारों से प्रभावित थे। वे यह जानना चाहते थे कि अलग-अलग परंपराओं में जीवन और अस्तित्व को लेकर कही गई बातों में क्या समानताएँ हैं। इसी जिज्ञासा ने उन्हें भारतीय दर्शन और उपनिषदों के अध्ययन की ओर प्रेरित किया। 📜 1655 में उन्होंने 'मज्मा-उल-बहरैन' (दो समुद्रों का संगम) नामक ग्रंथ लिखा। इसमें उन्होंने सूफ़ी और वेदांत दर्शन के बीच समानताओं को समझाने का प्रयास किया। 🔎 इसके बाद उन्होंने संस्कृत विद्वानों की सहायता से 52 उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद कराया। यह कार्य 1657 में 'सिर्र-ए-अकबर' (महान रहस्य) नाम से पूरा हुआ। उस समय फ़ारसी मुगल दरबार और विद्वानों की प्रमुख भाषाओं में थी। इस अनुवाद से संस्कृत न जानने वाले फ़ारसी पाठकों के लिए भी उपनिषदों का अध्ययन संभव हुआ। 🌍 आगे चलकर फ्रांसीसी विद्वान अंकेतिल-दुपेरों ने इन्हीं फ़ारसी अनुवादों के आधार पर उपनिषदों का लैटिन अनुवाद प्रकाशित किया। इससे यूरोप में भारतीय दर्शन के अध्ययन का एक नया रास्ता खुला। ⚔️ लेकिन दारा शिकोह का राजनीतिक जीवन अलग दिशा में गया। 1658 में उत्तराधिकार के संघर्ष में वे अपने भाई औरंगज़ेब से हार गए और 1659 में उनकी हत्या कर दी गई। उनका जीवन छोटा रहा, लेकिन विभिन्न परंपराओं को समझने का उनका बौद्धिक प्रयास इतिहास में दर्ज हो गया। 🪞 यहाँ प्रश्न हमारी अपनी जिज्ञासा का भी है। हम अक्सर अपनी परंपरा, समूह और विरासत में मिली मान्यताओं को ही अंतिम मान लेते हैं। लोकधर्म हमें इन्हीं पहचानों से बाँधे रखता है। अहंकार को किसी विचार की सच्चाई जानने से अधिक अपनी पहचान बचाने की चिंता होती है। इसलिए जो बात हमारी मान्यता के विरुद्ध जाती है, उसे हम बिना समझे ही ठुकरा देते हैं। वास्तविक जिज्ञासा का अर्थ केवल नए विचार पढ़ना नहीं, बल्कि अपनी पुरानी मान्यताओं को जाँचने के लिए तैयार होना है। ❓ जब कोई तथ्य आपकी वर्षों पुरानी मान्यता को गलत साबित करता है, तब आप क्या करते हैं? A. अपनी मान्यता को बचाने के लिए तर्क खोजता हूँ। B. उस तथ्य को गलत साबित करने की कोशिश करता हूँ। C. अपनी मान्यता पर दोबारा ईमानदारी से विचार करता हूँ। D. सुन तो लेता हूँ, लेकिन भीतर कुछ बदलने नहीं देता। 🔗 स्रोत: https://museumsofindia.gov.in/repository/record/vmh_kol-R431-C230-2569 https://cjh.uchicago.edu/issues/spring17/8.6.pdf















































