
अवलोकन - आउटरीच करते हुए मुझे तीन महीने हो गए । इन तीन महीनों में मैने क्या पाया ,ये बताना बहुत मुश्किल है । कभी मैने जिनके सपने देखे थे कि ऐसे करूंगी ,वैसे करूंगी पर होगा या नहीं ,कब होगा ,कोई आइडिया नहीं था । ये सब संभव तभी हो पाया जब कदम दहलीज़ के पार रखा । वास्तव में डर बाहरी कम ,भीतरी ज्यादा होते हैं। एक डरा हुआ व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। लेकिन अपने पिंजरे तोड़ने की थोड़ी भी जिद्द है तो डर मायने नहीं रखता है । आचार्य जी बाते हमारे गूँजती है - जैसे हो वैसे ही चलो पर चलो । रुकना नहीं है। डर है तो उसके साथ ही चलो । तुम कब बेहतर हो जाओगे तुम्हे खुद को भी पता नहीं चलेगा । जो जीवन अभी जी रही हु एक ख्वाब सा लगता है । बस इस ख्वाब को हमेशा जीने का चुनाव करू । 🌸 शरीर के लिए व्यायाम और मन के लिए आध्यात्म दोनों जरूरी है । 🌸 धन्यवाद आचार्य जी 🙏🙏





















