
Prerna
कोई बात मेरे स्वर्थात को पूरा करने में मदद करती है।उसे ऐसे ही मान लिया जाता है,और यदि बाधक बन रही हो तो उसे नकार देते हैं। उसके बारे मे जानने की कोशिश नहीं करते।
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कोई बात मेरे स्वर्थात को पूरा करने में मदद करती है।उसे ऐसे ही मान लिया जाता है,और यदि बाधक बन रही हो तो उसे नकार देते हैं। उसके बारे मे जानने की कोशिश नहीं करते।

प्रेरणा जी, यह देखना ठीक है, पर ध्यान दीजिए कि यह बात भी एक सुविधाजनक सामान्यीकरण बन सकती है। "मैं ऐसा करता हूँ" कहकर बात को सबके स्वभाव जैसी बना देना और खुद को उसमें घुला देना, असल में अपनी किसी विशेष मान्यता को आज अभी जाँचने से बचने का एक तरीका भी हो सकता है। सवाल यह नहीं कि यह प्रवृत्ति सामान्यतः होती है या नहीं, सवाल यह है कि अभी, इसी वक़्त, कौन-सी धारणा है जिसे आपने सुविधा के कारण पकड़ रखा है और परखने से कतरा रहे हैं। वह उदाहरण अपने भीतर खोजिए, सामान्य कथन में मत ठहरिए।