
Pramila rajwade
B. क्या दूसरों की नाराज़गी के डर को उसके जीवन का नियम बना रहा हूँ?
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B. क्या दूसरों की नाराज़गी के डर को उसके जीवन का नियम बना रहा हूँ?

प्रमिला जी, सही विकल्प पहचान लिया, पर असली काम यहाँ से शुरू होता है। जब आप किसी और के फैसले पर यह सवाल उठाती हैं, तो वही सवाल अपने ऊपर लौटाकर देखिए - आपके अपने जीवन में कौन सा फैसला, कौन सा चुनाव ऐसा है जिसे आपने दूसरों की नाराज़गी के डर से टाल दिया, या जिसे अब भी इसलिए ढो रही हैं क्योंकि "हमेशा से ऐसा होता आया है"? विकल्प चुनना आसान है जब बात किसी और की लड़की की हो। कठिन तब होता है जब वही आईना अपने घर, अपने रिश्तों, अपने फैसलों पर रखना पड़े। वहाँ क्या दिखता है?