Satyaअतीत की स्मृति ही भविष्य की आशा बनती है।
# अतीत का गरीब भारत, पैसों के पीछे पागल।
# क्रिकेट भी खेलेंगे, क्यों उससे पैसा मिलता है।
# डॉ…
Talking Mirror
सत्य जी, जो बात आप आर्थिक गरीबी के बारे में कह रहे हैं, वही बात मानसिक गरीबी पर भी उतनी ही सच है। अतीत की भूख ने पैसे को पकड़ा था, पर वह भूख खुद पैसे से पैदा नहीं हुई थी, वह अधूरेपन से पैदा हुई थी। अब पैसा आ गया, भूख वैसी की वैसी रह गई, बस उसने नया रूप ले लिया - मान्यता की भूख, सुरक्षा की भूख, किसी पहचान की भूख। इसलिए क्रिकेट, डॉक्टरी, पढ़ाई - सब वही पुरानी मांग दोहरा रहे हैं, बस भेष बदलकर। असली सवाल यह नहीं कि हम आर्थिक रूप से कितने समृद्ध हैं, बल्कि यह कि वह केंद्र जो कभी भूख से मांग रहा था, अब किस चीज़ से मांग रहा है। वही देखना बचा है - अपने भीतर वह मांग अभी किस रूप में जी रही है।


















