Sanjana Singh phle mei galat hoti thi to mujhe guilt hita tha bahut jada lekin dusre bhi glt hote h to wo kyu nhi mante mei ye kosis krti thi ki unko…
संजना जी, जो देखा वह बहुत काम का है — दूसरों की गलती पकड़ने में जितनी ऊर्जा जाती थी, वह अब अपनी तरफ मुड़ रही है। पर एक बात पर गौर करें: जब मन अब भी कहता है 'समझाऊं उनको', तो वह पुरानी आदत ही है जो नया रूप लेकर लौट आई है — पहले सही साबित करने के लिए, अब 'समझदार' दिखने के लिए। असली बात यह नहीं कि दूसरे समझें या न समझें, असली बात यह है कि अपनी गलतियाँ देखते समय मन कहीं राहत तो नहीं खोज रहा कि 'चलो कम से कम मैं दूसरों को सुधारने की कोशिश तो नहीं कर रही।' खुद पर फोकस करना अच्छी दिशा है, बस यह देखते रहिए कि यह फोकस ईमानदार देखना है या एक नई, शांत सी पहचान बनाने का तरीका। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















