
🪞 अवलोकन 🌸 जब कभी भी रुकती हूं, ठहरती हूं और अपने इस "मैं" की परिभाषा ढूंढती हूं तो डर जाती हूं। एक अज़ीब सी बात है: 😶 आज जैसी हूं, वैसी नहीं हूं मैं, जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है, पहले जैसी थी क्या वैसा बने रहना पसंद था मुझे, तो भी जवाब न में ही आता है। एक अज़ीब सी बेचैनी है, शायद अपनी पहचान किसी विषय से जोड़ना चाहती हूं। कुछ ढूँढ रही हूं, और जब कुछ भी ऐसा नहीं मिलता जिसपे टिका जा सके, जिसके लिए कह सकूं कि हां यही चाहिए था, तो बेचैनी बनी ही रह जाती है। शायद ये भी कारण नहीं है। ❌ ध्यान से सोचा तो कुछ बातें समझ में आईं। कोई है जिसे ये बात पता नहीं चलनी चाहिए थी कि, जो उसे चाहिए वो नहीं मिल सकता यहां। क्यूंकि वो झूठी आश में ही जी सकता था। और बिना किसी विषय के उसका टिक पाना संभव नहीं है, शायद उसका भ्रमित रहना ही उसके Existence के लिए ज़रूरी था। 🪞अवलोकन: जिसने देख लिया है, अपने मिथ्यत्व को , उसका अब survive कर पाना संभव नहीं है। कुछ भी छोड़ा या पकड़ा नहीं जाता देखने के बाद, बस कुछ समझ आ जाता है। इसमें कोई महानता भी नहीं है, इसमें भी स्वार्थ ही है, क्यूंकि कौन जानते बुझते अपना नुकसान कराए। 💫_आचार्य जी ने कई बार कहा है: -_ 🫵तुम यहां अपनी मर्ज़ी से नहीं आए हो। तुम यहां ग़लती से आए हो। इससे एक फ़िल्मी गीत याद आती है। जिंदगी की तलाश में हम (अहंकार)। मौत के कितने पास आ गए।। जब ये सोचा तो घबरा गए। आ गयें, ये कहां आ गयें??😂 बस नेति-नेति के माध्यम से कहानी ख़त्म होता जाए। अब न कोई कहानी चाहिए और न हीं कहानीकार।।🐽🐷 धन्यवाद! आचार्य जी 🙏





















