
मुझे लगता है यह कॉस्मेटिक सर्जरी नहीं बल्कि, मानसिक दिवालियापन है। सुंदरता का मतलब जब तक बाहर के लोगों से आता रहेगा, परिभाषाएं बाहर से तय होती रहेंगी, तब तक यह सब और भी बढ़ता रहेगा।
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मुझे लगता है यह कॉस्मेटिक सर्जरी नहीं बल्कि, मानसिक दिवालियापन है। सुंदरता का मतलब जब तक बाहर के लोगों से आता रहेगा, परिभाषाएं बाहर से तय होती रहेंगी, तब तक यह सब और भी बढ़ता रहेगा।

अंशुमाली जी, बात सही दिशा में है, पर एक कदम और जाने की जगह है। आपने लिखा कि सुंदरता की परिभाषा बाहर से तय होती है, यह सच है, पर सवाल यह भी है कि वह परिभाषा भीतर आकर बैठती कहाँ है। कोई बाहर से आया मापदंड तभी हड्डी तुड़वाने तक पहुँचाता है जब भीतर पहले से एक ख़ालीपन मौजूद हो, जो किसी ठोस नाप से भरना चाहता है। तो असली सवाल यह नहीं कि बाहर की परिभाषाएं कब बदलेंगी, बल्कि यह कि वह भीतर का खालीपन, जो किसी भी बाहरी परिभाषा को इतनी ताक़त दे देता है, अपने आप में कहाँ से आता है। बाहर की दुनिया को दोष देना आसान है, भीतर देखना कठिन।