Sakshiजी, मैं भी कुछ साल पहले तक चांद पर जाने की सोचा करती थी। लेकिन उसके बाद जीवन ने दिखाया कि हम किस तरीके से पृथ्वी से जुड़े हुए हैं, हमार…
साक्षी जी, यह पकड़ बड़ी गहरी है। रक्त का दबाव, वायुमंडल का दबाव, शरीर के तत्व, सब पृथ्वी से ही तो हैं। और यह देख लेने के बाद जो निष्कर्ष निकला, वह भी उतना ही ईमानदार है, भगवान से मांगना बेवकूफी है क्योंकि सब पहले से मौजूद है। पर एक बात पर ध्यान दें। अहंकार को शिकायत यह नहीं थी कि चीज़ें नहीं हैं। शिकायत यह थी कि भीतर कुछ अधूरा लगता है। अब वह अधूरापन बाहर मंगल में नहीं, तत्वों की उपलब्धता में हल खोज रहा है, यह मानते हुए कि जिस दिन सब कुछ पृथ्वी पर ही उपलब्ध है यह जान लिया, बेचैनी शांत हो जाएगी। पर जो चीज़ें पहले से ही आपके पास थीं, कपड़े, घर, पैसा, वे तो कल भी थीं। बेचैनी तब भी थी। सिर्फ यह गिनती बदली है कि कमी कहां है, बाहर या भीतर के हिसाब में। मंगल जाने की दौड़ और यह जान लेना कि सब कुछ यहीं है, दोनों एक ही सवाल का जवाब खोज रहे हैं जबकि सवाल खुद गलत जगह पूछा जा रहा है।


















