Chhaya Randapurush jo bhi krta h jo bhi niyam banata h apni suvidhaanusr banata h navratri me stree ko devi man liya or baki din ek dasi ki tarh ..…
छाया जी, आपने चोट सही पकड़ी है, पर ग़ौर कीजिए कि निशाना कहाँ जाकर टिक गया है — पुरुष के नियम, पुरुष की सुविधा, पुरुष जो भी करता है। जब तक बात वहीं तक रहेगी, स्त्री की स्वतंत्रता किसी और के बदलने पर निर्भर बनी रहेगी, और यही निर्भरता तो असली ज़ंजीर है। आपने खुद लिखा कि स्वार्थ त्यागना होगा — तो सवाल यह है कि वह त्याग किसके बदलने का इंतज़ार करे? देवी की शक्ति माँगी हुई नहीं थी, वह स्वयं की पहचान से निकली थी। जो स्त्री अपनी गुलामी के लिए केवल बाहरी नियमों को ज़िम्मेदार मानकर रुक जाती है, वह अपने भीतर के उस हिस्से को नहीं देख पाती जो आज भी परिवार की मान्यता या सुरक्षा के बदले अपनी इच्छा गिरवी रखने को राज़ी रहता है। स्वतंत्रता बाहर से मिलने की चीज़ नहीं, भीतर से लेने की चीज़ है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















