
जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है। 1. लड़की को बाहर धूप मिट्टी में खेलने भेजते हैं तो, वह काली, हो जाती है, बाल व खाल खराब हो जाती है, चोट लगती है तो कौन बियाह करेगा इससे 😅 2 पिरियड आ जाता है, तो दौड़ धूप नहीं करना चाहिए अधिकतर जगह कोच व साथ वाले पुरूष होतें हैं, गलत संगत में पड़ सकती है, पिरियड में स्विमिंग कैसे करेगीं 😅 2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं? शरीर को जरूरत होती है खेलने की, पर अहंकार कहता है क्यो परेशान होना है मस्त पड़े रहो,सुवर की तरह खाओ व लोट जाओ। कौन दोडे़ अहंकार चाहता ही नहीं की उसकी गंदी आदत छूटे, उसे खेलने से भय लगता है क्योंकि उसमें मेहनत लगती है, संघर्ष करना पड़ता है स्वयं से। 3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें। हाँ आचार्य जी हम आचार्य जी के गीता सत्रों से जुड़े हैं, तब से आचार्य जी ने सदैव प्रेरित किया है कुछ ना कुछ सीखों,मेने स्विमिंग सीखी है





















