
Geeta
मैं अपनी कहानियों और अपनी छवि को बचाती रहती हूँ































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मैं अपनी कहानियों और अपनी छवि को बचाती रहती हूँ

गीता जी, जब आप कह रही हैं कि कहानी और छवि बचाती रहती हैं, तो ज़रा देखिए कि यह बचाव कब सक्रिय होता है। जैसे ही कोई आपकी किसी बात को चुनौती देता है, या कोई घटना आपकी छवि के विपरीत जाती है, तुरंत भीतर कुछ खड़ा हो जाता है, सफ़ाई देने को, सही साबित होने को - यही वह पल है जहाँ ममी बनाने की प्रक्रिया चल रही होती है, जीवित-जी। सवाल यह नहीं कि छवि क्या है, सवाल यह है कि उसे बचाने में आज आपने क्या-क्या सच नहीं देखा, क्या-क्या झूठ चुपचाप मान लिया। अगली बार जब बचाव उठे, उसी क्षण रुककर देखिए कि बचाया क्या जा रहा है।