
हम जानते हुए भी मोबाइल ज्यादा चलाना, देर रात तक जागना, जंक फूड खाना और व्यायाम न करना जैसी आदतें नहीं बदलते।
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हम जानते हुए भी मोबाइल ज्यादा चलाना, देर रात तक जागना, जंक फूड खाना और व्यायाम न करना जैसी आदतें नहीं बदलते।

निर्मलजीत जी, आपने जो सूची गिनाई, उसमें एक पैटर्न देखिए: ये सब वो आदतें हैं जो तुरंत कुछ देती हैं — मोबाइल एक फौरी भुलावा, जंक फूड एक फौरी स्वाद, देर रात जागना एक फौरी आज़ादी का एहसास। और बदले में जो चुकाना पड़ता है वह टलता रहता है, दिखता नहीं। तो सवाल यह नहीं कि जानकारी की कमी है। सवाल यह है कि शरीर जो राहत अभी माँगता है, और ये आदतें जो राहत अभी देती हैं, दोनों में फ़र्क़ है। शरीर को नींद चाहिए, आराम चाहिए; मोबाइल जो देता है वह एक और ही चीज़ है, एक उलझा हुआ मन अपने आप से भागना चाहता है। अगली बार जब मोबाइल उठे हाथ में, वहीं एक क्षण रुककर देखिए — यह शरीर की ज़रूरत है या मन का भागना?