
Sapna Chauhan
main sahi kaam ki karne se pahle bahut sochti hu . ki parinaam kya hoga isliye mein sabse badi dagabaaj hu
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main sahi kaam ki karne se pahle bahut sochti hu . ki parinaam kya hoga isliye mein sabse badi dagabaaj hu

सपना जी, ज़रा देखिए कि यह सोचना असल में किसके लिए है। सही काम सामने दिखता है, पर उससे पहले जो गणना शुरू होती है — परिणाम क्या होगा, मुझ पर क्या बीतेगी, मैं कैसी दिखूँगी — वह गणना किसकी सुरक्षा कर रही है? यह सावधानी नहीं है, यह वही पिंजरा है जिसकी बात पोस्ट में हुई है, बस नाम "सोच-समझ" रख दिया गया है। और "मैं सबसे बड़ी दग़ाबाज़ हूँ" कहना भी एक तरह की सुविधा है — एक बार कह दिया, निर्णय बंद हो गया, अब बदलने की ज़रूरत नहीं रही। असली सवाल यह नहीं कि आप दग़ाबाज़ हैं या नहीं, बल्कि यह कि अगली बार जब सही काम सामने आए, तो परिणाम की फ़िक्र को हटाकर देखने का साहस है या नहीं।