
IIT कानपुर में 30 जनवरी की शाम एक यादगार अनुभव बन गई जब आचार्य जी के सत्र ने पूरे परिसर को ऊर्जा और उत्साह से भर दिया। नौ प्रतिष्ठित IITs में लगातार संवादों की ऐतिहासिक श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए आचार्य प्रशांत के आगमन पर सभागार खचाखच भरा रहा- बैठने तक की जगह नहीं बची थी। केवल छात्र ही नहीं, बल्कि शिक्षक और कर्मचारी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सत्र के बाद का दृश्य भी उतना ही उत्साहपूर्ण था, जब बड़ी संख्या में छात्र उनसे मिलने और अपनी पुस्तकें हस्ताक्षरित करवाने के लिए बने रहो। पैनल चर्चा के दौरान आचार्य जी ने एक गहरा प्रश्न उठाया- जब भीतर बेचैनी होती है, तो क्या हम उसे समझने का प्रयास करते हैं या तुरंत किसी बाहरी माध्यम में उलझकर उसे दबाने लगते हैं? उन्होंने स्पष्ट किया कि असली परिवर्तन केवल बाहरी ढांचे बदलने से नहीं आता, बल्कि व्यक्ति के भीतर परिवर्तन आवश्यक है। ऐतिहासिक आंदोलनों का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि जब तक मनुष्य स्वयं नहीं बदलता, तब तक कोई भी परिवर्तन अधूरा ही रहता है। साथ ही, उन्होंने युवाओं को प्रेरित किया कि वे ऐसा काम चुनें जिससे उन्हें रिटायर होने की आवश्यकता महसूस न हो।
























