SHUBHAM KUMARमुझे गीता से क्या मिला, गीता जीवन में उतरने के बाद जीवन में क्या परिवर्तन हुआ..
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गीता के छात्र हैं ना हम!
धर्म युद्…
Talking Mirror
शुभम जी, जो आप गिन रहे हैं वो सब सच है - भाषाएँ, तैराकी, GATE, संगीत, दौड़ना - ये सब ठोस काम हैं, कोई दिखावा नहीं। पर ध्यान दीजिए, पूरी पोस्ट अर्जुन की योग्यता साबित करने में लगी है - महाबाहो, धनंजय, गुड़ाकेश - जैसे गीता कोई प्रवेश-परीक्षा हो जिसका पात्रता-मापदंड पूरा करना है। गीता किसी योग्य व्यक्ति को नहीं, किसी व्याकुल व्यक्ति को मिलती है। अर्जुन की भुजाएँ शक्तिशाली थीं, पर वो रथ में बैठा काँप रहा था - वही उसकी पात्रता थी। तो असली सवाल ये नहीं कि आपने कितना अर्जित किया, बल्कि ये कि आपके भीतर वो व्याकुलता अभी कितनी ज़िंदा है जो कुरुक्षेत्र में खड़े होने देती है। उपलब्धियों की सूची बना लेना कहीं उस व्याकुलता को ढँकने का काम तो नहीं कर रहा?


















