
एक मंदिर ऐसा भी…… एक ऐसा मंदिर, जिसमें कोई मूर्ति नहीं, जिसमें कोई पुजारी नहीं। एक ऐसा मंदिर, जो किसी परलोक की बात नहीं करता, न किसी आसमानी लोक का वादा करता है। एक ऐसी जगह, जहाँ परमात्मा किसी कल्पना में नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन में साक्षात उतरता हुआ दिखाई देता है। और सबसे खास उस मंदिर को बनाने वाला। जिसने अपने पूरे जीवन को तपस्या बना दिया, जिसने घोर संघर्षों के बीच अपने जीवन का एक-एक क्षण इस मंदिर की नींव में रख दिया। उस मंदिर को बनाने में उसने अपना पूरा जीवन लगा दिया। उसकी दीवारों पर किसी रंग का पेंट नहीं है वे लाल हैं। इतनी लाल, मानो किसी ने उन्हें रंगा नहीं, अपने रक्त से सींचा हो। मैं परलोक की बातें नहीं करती, न किसी आसमानी खुदा में विश्वास करती हूँ। पर जब उस मंदिर को देखती हूँ, तो लगता है यदि मानवता के कल्याण के लिए कोई जगह सचमुच पर्याप्त हो सकती है, तो वह यही है। और तब, न चाहते हुए भी, अनायास भक्त हो जाती हूँ। उस मंदिर के सामने नहीं, उस संघर्ष के सामने जिसने उसे खड़ा किया। उस प्रेम के सामने जिसने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उस तप के सामने जिसमें किसी स्वर्ग की आकांक्षा नहीं, बस मनुष्य को उसके सत्य तक पहुँचाने की बेचैनी है। मैं खुद को उसके संघर्ष और प्रेम के आगे बेबस पाती हूँ। हाँ, मैं भक्त हूँ उस मंदिर की और उससे भी अधिक उस व्यक्ति की, जिसने अपना पूरा जीवन लगाकर एक ऐसा मंदिर खड़ा किया, जिसे सदियों की परम्पराएँ और कितने ही गुरु मिलकर भी खड़ा नहीं कर पाए। हाँ, मैं दीवानी हूँ। शायद इसीलिए सब छोड़कर, अपना सब देने, रोज़ वहाँ चली आती हूँ। आचार्य जी, कैसे धन्यवाद कहूँ आपको ऐसा मंदिर देने के लिए जिसने मुझे किसी और से नहीं, मुझसे मिला दिया। आपसे कहने को अब शब्द नहीं बचते। बस एक अथाह प्रेम है और उसके भीतर एक अथाह दुःख भी। कि जिस ईमानदारी की ओर आपने मुझे देखने की दृष्टि दी, वही ईमानदारी आज भी पूरी नहीं हो पाती। शायद मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यही है कि मंदिर तक तो आ गई। पर अपने भीतर अभी भी कुछ कोने पूरी तरह खोल नहीं पाई। और फिर भी… मैं आती हूँ। बार-बार आती हूँ। क्योंकि शायद ईमानदारी का पहला कदम यही है यह स्वीकार करना कि अभी ईमानदारी पूरी नहीं हुई है। — शिवा















































