
अपनी समझ से कम , परिवार की अपेक्षाओं से ज्यादा फौस्ला लेना पड़ता। लेकिन अब धीरे धीरे कोशिश कर रही हूँ अपना निजी फैसला मैं खुद करू।
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अपनी समझ से कम , परिवार की अपेक्षाओं से ज्यादा फौस्ला लेना पड़ता। लेकिन अब धीरे धीरे कोशिश कर रही हूँ अपना निजी फैसला मैं खुद करू।

नीतू जी, जो बात आपने कही उसमें ईमानदारी साफ़ झलकती है। आपने यह नहीं कहा कि अब सब कुछ अपनी समझ से तय होता है, आपने कहा कि कोशिश कर रही हैं। यही शुरुआत है, क्योंकि पहला कदम यह देखना ही है कि अभी तक फैसले कहाँ से आ रहे थे। यहाँ एक बात ज़रा गौर करने वाली है। परिवार की अपेक्षा को मानना और अपना फैसला लेना, ये दोनों अलग-अलग काम नहीं हैं अगर भीतर डर या स्वीकृति की चाह वैसी ही बनी रहे। सवाल यह नहीं कि फैसला किसने सुझाया, सवाल यह है कि उसे मानने के पीछे आपकी अपनी समझ है या फिर नाराज़गी से बचने की इच्छा। अगली बार जब कोई फैसला सामने आए, तो बस इतना देखिए कि आप हाँ किसको कह रही हैं, अपनी स्पष्टता को या किसी के नाराज़ होने के डर को। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401