
यह अवलोकन लिखने में थोड़ी खुशी भी हो रही भीतर से 🥰 पहली तस्वीर में मेरी माता जी और बड़े भाई है जिनको मैं पहली बार 19 जुलाई,2026 को ऑफलाइन सत्र में लेकर आई थी। दोनों लोगों ने HIDP एक्टिविटी में भाग भी लिए। हालांकि इन्होंने बहुत ज्यादा भाग नहीं लिया लेकिन इनको वहाँ ग्रुप में खड़े होने मात्र से ही मजा आ गया था। इस सत्र और एक्टिविटी का प्रभाव यह हुवा कि दोनों लोग सत्र से वापस जाने के बाद से रोज अपने व्हाटसअप पर आचार्य जी के स्टेटस लगाते है। मम्मी तो पूरा दिन AP ऐप पर ऊपर नीचे स्क्रॉल करती रहती है, और आज तो उनको मैंने गीता परीक्षा भी दिलवाया है। गीता सत्र से किसी को भी जोड़ने में या गीता सत्र के बारे में बताने में एक अलग ही मजा है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर बायोलॉजिकल परिवार का कोई सदस्य जुड़ता है तो और ज्यादा मज़ा आता है, मैंने ऐसा महसूस किया आज😋 मैं आगे और भी कोशिश करूंगी कि इनके साथ साथ और लोगों को गीता सत्र से जोड़ पाऊं। दो साल पहले मेरी इस यात्रा कि शुरूआत हुई थी, शुरुवात भी ऐसी थी जब रात को आराम से सबके सोने के बाद अपने कमरे में अकेले गीता सत्र सुनती थी। धीरे धीरे सबको पता चला रात को मैं पढ़ती हूं उसके बाद घर वालो को और ज्यादा स्पष्टता हुई कि मैं आचार्य जी के सत्र देखती हूं। उसके बाद धीरे धीरे विरोध हुआ कुछ समय तक😀 लेकिन मुझे तो सुनना था आचार्य जी को क्योंकि गीता सत्र में कुछ ऐसा हो रहा था जो हम सबकी भीतर कि तलाश होती है, यह बात थोड़ी थोड़ी समझ आने लगी थी। गुवाहाटी में कुछ समय के बाद ही बुक स्टॉल कि प्रक्रिया शुरू हो गई, शुरूआत के दिनों में 2-3 वॉलंटियर मिलकर रविवार को बुक स्टॉल लगाते। धीरे धीरे गीता सत्र, बुक स्टॉल कैसे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया पता ही नहीं चला मुझे। इतना कुछ होते होते एक बात समझ आने लगी थी कि आचार्य जी को सुनने के बाद आप खुद को कमजोर या परनिर्भर होना पसंद नहीं करते वही हो रहा था मेरे साथ। आचार्य जी को लगभग एक साल तक सुनने के बाद मैंने अपनी जॉब कि शुरूआत कि मई 2025 में। कोशिश तो मैं पिछले कई सालों से कर रही थी लेकिन भीतरी स्पष्टता न होने के कारण घर से बाहर निकलने का प्रयास नहीं कर पा रही थी। यदि जीवन में आचार्य जी नहीं आए होते तो, मुझे भी नहीं पता कि यह संभव भी था या बस एक प्रयास मात्र ही रह जाता जीवन भर। अब धीरे धीरे यह बात स्पष्ट होने लगी है कि आचार्य जी कि शिक्षाएँ मात्र दो दिन कि क्रांति वाली नहीं, बल्कि एक ऐसा प्रयास है जिसमें व्यक्ति ही बदल जाता है। धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥ आचार्य जी हम सबको किस सयंम के साथ सिंच रहे है इसको देख पाने के लिए हमारे पास वो प्रेम होनी चाहिए।🙏🪔







































