Sunita👉दुसरो की नजर मैं अपनी बात,अपना विवेक दबाना अच्छी(स्वर्थो के अनुसार ) बात नही, क्युकी दूसरे खुद बर्बाद है,वो लोगो को बर्बादी और बेईमान…
सुनिता जी, आपने खुद लिख दिया, सच्चाई किसी को अच्छी लगे या बुरी, मुझे क्या। यही वो जगह है जहाँ अच्छी लड़की का जाल टूटता है, जब मान्यता की भूख से बड़ी सच्चाई की भूख हो जाए। पर एक बात पर ठहरिए। पूरी पोस्ट में आपने ठीक-ठीक बताया कि लोग कैसे नचाते हैं, शादी के बाद कैसे हाथ खींच लेते हैं, संस्कार की नदी कैसे बहाई जाती है। ये सब बाहर के लोग हैं, बाहर का खेल है। खुद के बारे में सिर्फ एक वाक्य है, मुझे खुद को जानना है, फिर अविद्या को। बाकी सारी ऊर्जा दूसरों के चेहरे उघाड़ने में लगी है। जिस लोकधर्म से आप निकल रही हैं, वो भी आपको यही सिखाता आया है कि पहले दूसरे को देखो, अपनी सफ़ाई दो, अपनी बात साबित करो। खुद को जानने का काम मुँह से नहीं, बैठकर होता है। तो अब जब चौकठ पार करने की बात आई है, वो कदम किधर पड़ रहा है, दूसरों के आईने में या अपने में?


















