
✍🏻 पोस्ट 8 | 6 अक्टूबर '26 💭 विषय — ग्लोबल करंट अफेयर्स ───────── 🌾 ग्लोबल फ़ूड क्राइसिस: संकट मौसम का है, या हमारी भूख का? 🗣️ 29 सितंबर को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर कहा, "आने वाले महीनों में शायद एक बड़ा खाद्य संकट आने वाला है।" उन्होंने इसकी तीन वजहें गिनाईं: खाद की कमी, अनाज की ढुलाई में रुकावट, और "सुपर एल नीनो"। 📈 आँकड़े भी यही कह रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य संस्था FAO के मुताबिक सितंबर में दुनिया भर में खाने के दाम एक साल पहले से 5.8% ऊपर थे। गेहूँ 2023 के बाद सबसे महँगा हो गया है, और चीनी के दाम लगातार तीसरे महीने बढ़े। 🌍 वजहें कई हैं: ⛽ फ़रवरी के आख़िर में होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हुआ, और हालात अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं। दुनिया के करीब 42% urea निर्यात मध्य पूर्व से होते हैं। 🌡️ बहुत तेज़ "सुपर एल नीनो" बनने का ख़तरा है, जो मानसून और बारिश का संतुलन बिगाड़ता है। भारत की करीब 45% खेती आज भी पूरी तरह बारिश पर टिकी है, और इस साल मानसून दस साल से ज़्यादा में सबसे कमज़ोर रहा। 💰 बैंकिंग कंपनी JPMorgan का अनुमान है कि 2027 की पहली छमाही में दुनिया की खाद्य महँगाई करीब 5% तक जा सकती है। 🔒 पर संकट की आहट मिलते ही एक और चीज़ होती है। हर कोई अपना दरवाज़ा बंद करने लगता है। खाद्य नीति पर काम करने वाली संस्था IFPRI के मुताबिक जब बड़े देश खाद या अनाज का निर्यात रोकते हैं, तो दाम पर उसका असर 3 से 5 गुना तक ज़्यादा होता है। और उधर अमीर देशों की खाद्य सहायता 2024 से 2026 के बीच करीब 44% घटने का अनुमान है। मार ग़रीब देशों पर पड़ती है। 🗑️ और यह सब तब, जब कमी अनाज की उतनी नहीं है। UN की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में दुनिया ने करीब 105 करोड़ टन खाना फेंका, यानी कुल खाने का करीब पाँचवाँ हिस्सा। उसमें से 60% घरों से फेंका गया। उसी समय 78 करोड़ से ज़्यादा लोग भूखे थे। 🤔 तो संकट किसका है? हम इसे मौसम या युद्ध पर डाल देते हैं। पर इसकी एक जड़ हमारे भीतर है: भोगने की वह आदत, जो लगातार बढ़ती आबादी और हर आदमी की बढ़ती खपत में दिखती है। 😶 फिर भी जब जलवायु या खाने के संकट की बात होती है, तो हम में से कई बस कंधे उचका देते हैं, "हमें क्या फ़र्क पड़ता है?" 🪞 और जब डर आता है, तो हमारी भलाई सिकुड़कर बहुत छोटी हो जाती है। पहले "मेरा देश", फिर "मेरा घर", फिर "मेरी थाली"। जो बँटी हुई भलाई सिर्फ़ अपनों तक जाती है, वही बाकियों के लिए संकट को और गहरा कर देती है। हम कहते हैं कि संकट "आने वाला" है। पर जिसकी थाली आज खाली है, उसके लिए वह कब का आ चुका है। ❓ संकट की ख़बर सुनकर आपको पहला ख़याल किसका आता है: अपनी थाली का, या उस मूल केंद्र का जिसकी वजह से थाली खाली है? 📚 स्रोत: 1. FAO फ़ूड प्राइस इंडेक्स (2 अक्टूबर 2026): https://www.fao.org/worldfoodsituation/foodpricesindex/en/ 2. Daily Pioneer (29 सितंबर 2026): https://dailypioneer.com/news/jaishankar-warns-of-food-crisis-as-centre-trims-foodgrain-target
















































