
🌀हम समय - समय पर अपनी वृत्ति के अनुरूप व्यवस्था को दोष देते हैं जब मैं स्कूल जाती थी तो सोचती थी गर्मी की छुट्टी और लंबी होती, क्लासें कम होतीं , पढाई के अलावा और भी कुछ सिखाया जाता है ....ये सब इसीलिये चाहती थी की पढाई कम करनी पड़े। 🌀जब नौकरी की तयारी करने लगी तो दोष देती थी की... वैकेंसी कम आती है, अच्छे कोचिंग संस्थान नहीं हैं, अच्छे शिक्षक नहीं हैं। मेरे पास उत्ने पैसे नहीं है....ये सब इसीलिये था ताकी मैं अपनी कमजोरी छुपा सकु और मुझे अपने भीतर देखना ना पड़े... 🤦आज भी वही कर रही हूं अपने भीतर की व्यवस्था के साथ .... आचार्य जी से जुड़ने के बाद लोकधार्मिक तरिके से पूजा पाठ नहीं करती, बाल छोटे करवाए , अंगूठियां निकाल दी, सवाल करती हूं, बिंदी और सिन्दूर भी नहीं करती....क्यूंकि इन सबका जो महत्व बताया गया था वो बस मान्यताये थी....पर ये सब बाहरी परिवर्तन है जो मैं बदल पायी वो पहले भी सही नहीं लगता था...पर केंद्र अहम ही है क्योंकि जब "मैं" पे बात आती है तो उसको ही सही साबित कर देती हूं..... जब भी व्यवस्था को बदलने की बात होती है तो उसके मूल में मेरी ही कामनाएं मौजुद रहती हैं ....ऐसा लग रहा है जैसे ठहर गई हूं....🪔पर फिर से चलना गीता ही सिखाएगी....धन्यवाद आचार्य जी 🙏



















