
मैं बहुत परेशान हूं मैं अपने फर्ज को पूरा करना चाहता हूं लेकिन उसमें मेरी मां समझ नहीं पा रही है मैं उसकी सच्चाई बताना चाह रहा हूं लेकिन उसको मेरे ऊपर विश्वास नहीं है वह अभी चतुर्मास के व्रत कर रही है शरीर से बहुत कमजोर हो गई है और मैं उसको बताता हूं कि भैया खा ले वह खा ले फिर भी हो अपनी सीमा पर खड़ी है वह एक किताब है उसमें चातुर्मास कि उसमें लिखा है कि इसमें पलक नहीं खाना तुवर दाल नहीं खनिज दाल नहीं खाने मसूर दाल खाने फल नहीं खाने उसे शरीर से बहुत कमजोर है बहुत परेशान हूं मेरी बात मानती नहीं है और उससे ज्यादा जो मैं उसको बताता हूं कभी इनसे कुछ नहीं होना यह सब मां कि यह सब लोग धर्म की बातें हैं झूठी बातें इसे कुछ नहीं होगा भगवान अलग चीज है और भगवान को इस तरह नहीं मनाया जाता या पूजा जाता है तो करने को तैयार नहीं होती और मेरे अंदर जो मैंने गीता जी पढ़ के आचार्य जी से वेदांत में जो समझ हासिल की है वह उनको बताना चाहता हूं लेकिन और सुनने को तैयार नहीं है और मुझे ही भला बुरा कह के भगा देती है लेकिन मैं मुझे उसे भगाने का रोष नहीं है लेकिन मैं उनको सच्चाई बताना चाहता हूं क्योंकि वह अपने आप को झूठे पाखंड में पढ़कर अपने आपके शरीर को कमजोर कर रही है



















