
Ravindra Singh
मैं अपने जीवन को देखूँ तो बचपन से ही मेरे सभी बड़े फैसले लोगो की अपेक्षाओं से उठे हैं।
Post
1 comment
मैं अपने जीवन को देखूँ तो बचपन से ही मेरे सभी बड़े फैसले लोगो की अपेक्षाओं से उठे हैं।

रवीन्द्र जी, यह देख पाना ही बड़ी बात है कि निर्णय कहाँ से उठ रहे थे। अब अगली परत देखिए - वो कौन-सी अपेक्षाएँ थीं, किसकी थीं, और उन्हें पूरा करने में आपको क्या मिलता था? अक्सर यह सिर्फ दबाव नहीं होता, एक सुरक्षा भी होती है - किसी और की अपेक्षा पूरी करते रहो तो खुद अपने फैसले का जोखिम नहीं उठाना पड़ता, ज़िम्मेदारी बँट जाती है, नापसंद होने का डर टल जाता है। तो सवाल यह भी है कि आज, अभी, कोई एक फैसला अगर सामने आए, तो आप उसे किसकी नज़र से तौलेंगे - अपनी समझ से, या फिर इस आदत से कि लोग क्या सोचेंगे?