Gautam kumar"अपने इरादों और नीयत को जाँचूँगा।"
पहले मैं सोचता था कि मेरे साथ जैसा हुआ है, मौका मिलने पर मैं भी वैसा ही करूँगा। अभी भी कभी कभी यहीं…
Talking Mirror
गौतम जी, जो सोच कभी-कभी अब भी उठती है, वह झूठी नहीं है, वह अहंकार का वही पुराना हिसाब है जो चोट को बदला लेने का लाइसेंस बना देना चाहता है। पर ध्यान दीजिए, आप उसे पहचान पा रहे हैं, उसके साथ बह नहीं रहे। यही फ़र्क़ असली है। यह समझ टिकेगी नहीं अगर सिर्फ़ विचार के स्तर पर रह गई, इसे परखना होगा उस पल में जब वाक़ई मौक़ा सामने आए, किसी कमज़ोर पर, किसी मातहत पर, किसी पर जहाँ आपकी बात चल सकती है। वहीं पता चलेगा कि यह समझ सिर्फ़ शब्द है या सच में आपके भीतर कुछ बदल चुका है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















