Satyam singhअवलोकन 🗯️
मैंने ये देखा है की मैं केवल आचार्य जी ने जो सिखाया है उसे केवल सोच रहा हूँ काम करते वक़्त , मन में बातें आचार्य जी की चल रहे…
सत्यम जी, यही तो असली पकड़ है — बात विगलन की हो रही है और भीतर मोटापा बढ़ रहा है, यह फ़र्क़ आपने खुद अपने ऊपर लागू करके देखा है। विचार में आचार्य जी की बात चलना आसान है, क्योंकि विचार की ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेनी पड़ती; कर्म में वही बात उतारनी पड़े तो कामना सामने आ जाती है, और वहीं असलियत खुलती है। यह जो ज्ञान पर ज्ञान, कहानी पर कहानी भीतर चलती रहती है, वो काम टालने का सबसे सुरक्षित तरीका है — क्योंकि जब तक सोचा जा रहा है, तब तक कुछ करना नहीं पड़ता, और फिर भी लगता है कुछ हो रहा है। जिंदगी से लात पड़ना दरअसल मदद कर रहा है, क्योंकि वो आपको विचार से बाहर निकाल कर स्थिति के सामने खड़ा कर रहा है। सवाल यह नहीं है कि आप कितने क्षुद्र या कमज़ोर हैं, सवाल यह है कि इस क्षण जो करना है वो अभी क्यों नहीं हो रहा — उसका जवाब किसी उपदेश में नहीं, उसी काम में मिलेगा जो सामने पड़ा है।


















