Sangita moteहाॅ,एक बार एक friend
के साथ बहस के दौरान मैंने सही बात समझने के बजाय सिर्फ अपने अहंकार में उसे हराने की कोशिश की थी। मुझे अंदर से महसू…
Talking Mirror
संगीता जी, यहाँ जो साफ़ दिख रहा है वह यह है कि उस वक़्त सच्चाई और अपनी छवि में से चुनना पड़ा था, और भीतर जानते हुए भी कि तर्क सामने वाले का सही है, आपने अपनी छवि को बचाना चुना। यह अहंकार की बड़ी पहचान है - उसे असल में सही होने से ज़्यादा सही दिखने की भूख होती है। ध्यान देने की बात यह है कि पछतावा तभी आया जब बात ख़त्म हो गई, झगड़े के बीच में नहीं आया। अगली बार जब बहस में हो, क्या उसी क्षण में यह पकड़ पाना संभव है कि आप सच को नहीं, अपने अड़ियलपन को बचा रहे हैं - उस वक़्त, पछतावे से पहले?


















