
हमारी दृष्टि बाहर को देखने की इतनी आदि हो गई है कि अपनी खोट खुद ही नहीं देख पाती। जैसे खुद को देखते वक्त हाइपर्मेट्रॉपिया हो गया हो। सामने सबसे निकट की ही वस्तु नहीं दिखती। जब इस परंपरा के बारे में बात की जा रही थी तो मुझे लग रहा है कैसी अजीब परंपरा है। हमारे देश में तो नहीं है कुछ इतना अज़ीब। पर पोस्ट में अगली बात दुख गई। हमारी मान्यताएं हमें सामान्य और दूसरों की घोर असमान्य लगती है। वैसे ही बाहर लोगों की गलतियां तो दिख जाती है, पर अपनी ओर उंगली आते ही हम कहते है हम सबसे साफ है। हमपर कोई दाग नहीं है। बल्कि हमपर उंगली उठते ही हम अचकचा जाते है। ये क्या हो गया।



















