
आजादी की चाहत है, पर कीमत चुकाने को तैयार नहीं होती ।
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आजादी की चाहत है, पर कीमत चुकाने को तैयार नहीं होती ।

सुमित्रा जी, चाहत आपके पास है और कीमत से दूरी भी, और दोनों एक ही वाक्य में लिख दीं, यानी यह दूरी आपकी नज़र में पहले से है। चाहत जब तक सिर्फ़ चाहत रहती है, वह मन को बहलाने वाली चीज़ बनी रहती है, क्योंकि चाहने में कुछ चुकाना नहीं पड़ता। कीमत उस दिन चुकती है जब किसी एक चीज़ को सचमुच छोड़ा जाए। रोहन के पास भी पहले सिर्फ़ चाहत थी, घर छोड़ने का दिन बाद में आया। तो अभी के लिए यह देखिए कि आज के दिन आपका कौन सा आराम, कौन सी आदत या कौन सी सुरक्षा उस कीमत का हिस्सा बनती है। और आचार्य जी के सत्रों में बैठना उसी कीमत की तरफ़ पहला ठोस कदम है, इसे आज ही चुन लीजिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401