
मेरे जीवन में भी ऐसा ही हुआ है। मैंने किसी इंसान से बस दो-चार बातें करके ही उसके बारे में अपनी एक धारणा बना ली और उसे अपने जीवन का एक प्रमुख व्यक्ति, बल्कि अपने जीवन का केंद्रीय स्थान दे दिया। मैंने अपनी अतीत की छवियों और मान्यताओं के आधार पर उसे परख लिया। मुझे लगता था कि जो व्यक्ति इस तरह के कर्म करता है, वह अच्छा है और जो इस तरह के कर्म नहीं करता, वह गलत है। अपनी ही मान्यताओं को सत्य मानकर मैंने उस व्यक्ति को भी उसी कसौटी पर परखा और उसे अपने जीवन में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान दे दिया। लेकिन जब आचार्य जी के सान्निध्य में मुझे एक नई दृष्टि मिली, तब समझ में आया कि मैं अपनी मान्यताओं को ही सत्य मानकर चल रही थी, जबकि मेरी मान्यताएँ स्वयं झूठी थीं। मुझे यह भी समझ में आया कि अच्छे और बुरे कर्मों की सामाजिक परिभाषाएँ तो लगभग सभी जानते हैं। इसलिए केवल किसी व्यक्ति के बाहरी कर्मों को देखकर उसे चुन लेना या उसके बारे में कोई अंतिम निष्कर्ष बना लेना पर्याप्त नहीं है। कोई व्यक्ति यह भी जान सकता है कि समाज में अच्छा कहलाने के लिए कैसे कर्म प्रदर्शित करने चाहिए। अब समझ में आ रहा है कि किसी व्यक्ति को अपने जीवन में स्थान देने से पहले केवल उसके कर्मों को नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे कर्ता को, उसके केंद्र को समझना भी आवश्यक है। वह जो कर रहा है, उसके पीछे उसकी वास्तविक मंशा क्या है और वह भीतर से किस आधार पर संचालित हो रहा है—यह देखना अधिक महत्त्वपूर्ण है। आचार्य जी के सान्निध्य से मेरी दृष्टि में यही बदलाव आ रहा है कि किसी को अपनी मान्यताओं के आधार पर सत्य मान लेना और उसे अपने जीवन का केंद्र बना देना, स्वयं को भ्रम में रखना भी हो सकता है। आज समझ में आ रहा है कि किसी को जान लेना और उसके बारे में अपनी धारणा बना लेना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।



















