
आचार्य जी, प्रणाम। 🙏🙏 🌞 आचार्य जी, आज मेरा जन्मदिन है। लेकिन मेरा वास्तविक जन्म तो तब हुआ था, जब मैं गीता मिशन से जुड़ी — यानी पिछले 1.5 साल में। इन वर्षों में मैंने अपने बीते 20 सालों को देखा, जाना, समझा और बहुत सारे बंधन तोड़े। पहले ऐसा लगता था कि आचार्य जी तो बस बोल रहे हैं — बंधन तोड़ो, निकलो — लेकिन आचार्य जी को क्या पता, मेरे बंधन इतने मज़बूत हैं कि टूट नहीं रहे। फिर सत्र में निरंतर देखते-देखते, एक के बाद एक — न जाने कैसे — सारे बंधन पीछे छूट गए। जैसा कि आचार्य जी आप कहते हैं — “जब हम बड़े के लिए लड़ते हैं, तो छोटे अपने आप जीतते जाते हैं।” 🪔 आचार्य जी, आप हर सत्र में इतनी देर तक हमें समझाते हैं, दहाड़ते हैं, ताकि हम जाग सकें। सत्य से प्रेम का ही परिणाम है यह — प्रेम के बिना यह असंभव-सा लगता है। 🪔 एक नशा-सा छा रहा है, जब से आउटरीच शुरू की है। आचार्य जी, यह पंक्ति — “अड़े रहना मैदान में, सम्मुख सहना तीर” — मैंने काँपते हुए यह यात्रा शुरू की थी। आज सब ठीक है, क्योंकि जो लोग विरोध में हैं, वे भी साथ हैं। और अब साथ या न साथ मायने नहीं रखता — अब हमें सत्य की संगति प्रिय लगती है। 🪔 यह मेरी बचपन की आदत ही रही है। जब किसी प्रक्रिया को बार-बार दोहराते हैं, तो वह आदत बन जाती है। आचार्य जी, मैं अपनी क्लास की हमेशा से टॉपर रही हूँ, लेकिन सबसे ज़्यादा परेशान भी। क्योंकि मैं बहुत सवाल करती थी। सिलेबस से हटकर जो देखती, इतिहास के बारे में पूछती। घर पर भी कई विद्रोह किए — ऐसा क्यों होता है, भाई? लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं मिलता था, जो मुझे संतुष्ट कर सके। मेरी एक कमजोरी यह भी थी कि मैं रोने लगती थी। किसी से लड़ नहीं पाती थी — यानी जवाब नहीं दे पाती थी। अब मेरे पास इतने जवाब होते हैं कि सामने वाले प्रश्न करने से कतराते हैं। उनके पास सड़े-गले तर्क होते हैं, और जब मैं स्पष्ट बोलती हूँ, तो उन्हें भी समझ आता है कि बात तो सही बोल रही है। आचार्य जी, मेरे बड़े भाई को अच्छे से पता है कि आचार्य प्रशांत जो कर रहे हैं, वह वाकई बहुत सत्य है। खुद तो साथ नहीं आ रहे हैं, लेकिन उन्हें गीता मिशन से जॉइन कर दिया है। 🪔 आचार्य जी, बहुत-बहुत धन्यवाद। 🙏🙏 ❤️❤️ आप मिले — यह जन्म व्यर्थ जाने से बच गया। 🪔🙏 Love you forever, आचार्य जी। 🙏❤️❤️❤️ 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏






























