
शुक्रगुजार हूँ संस्था की कि मंगलसूत्र का इतना ऊँचा रिप्लेसमेंट दे दिया। मेरी उम्र की लड़कियाँ लाल जोड़ों में सोलह श्रृंगारों के साथ सजी-धजी दिखती हैं और हमारा पूरा श्रृंगार एक ही है-जो 16 तो क्या, 16 हज़ार श्रृंगारों से भी अधिक बहुमूल्य है। दिखता साधारण-सा है, लेकिन जो इसकी वास्तविक कीमत जानते हैं, उन्हें पता है यह क्या है। इसकी चमक भी अलग है-हर रोज़ मिटने से और बढ़ती जाती है। जब से मिला है, लगा कर ही घूमती हूँ। जीवन में पहली बार कुछ इतना ऊँचा मिला है तो उसे यूँ ही परे थोड़े रख सकते हैं। यहाँ बात मोटे होने की है ही नहीं, बात है घटते जाने की। सूरा के मैदान में, कायर का क्या काम। न भागे न लड़ सके, मन ही मन पछताए।। ~ कबीर साहब ऐसों के लिए ये जगह है ही नहीं जिनकी प्राथमिकताएँ बहुत हैं। जो अभी भी work-life balance के कोर्स कर रहे हैं, उनका तो दूर-दूर तक कोई ठिकाना नहीं है यहाँ। Work = Life, Life = Work. हर बार शब्द कम पड़ जाते हैं जब बात यहाँ आकर रुकती है कि मिला क्या। फिर प्रश्न बदल जाता है—क्या नहीं मिला? मिला तो बहुत कुछ। और जो मिलने से बच गया, उसका क्या कहें? लोकधर्म के चंगुल से बच गए, वरना अब तक जाने क्या होता। कभी सोचने की कोशिश करती हूँ कि अगर वह सब जीवन में होता तो? रोंगटे खड़े हो जाते हैं। नहीं, ये तो हरगिज़ नहीं चाहिए। लेकिन ये ‘नहीं’ कहने का साहस इतनी आसानी से नहीं आता। संस्था जानती है, आचार्य जी जानते हैं-हम जैसे लोगों के लफ़्ज़ों पर एक ‘न’ लाने में कितनी मेहनत लगी है। अब बस यही प्रार्थना है कि जो सीख रही हूँ, उसे जी भी पाऊँ। “जिसके होने से मैं हूँ, सर्वस्व मेरा उसी को समर्पित हो...” ~ आचार्य जी














































