
🌱 हर एक सत्र, जीवन को नई दिशा देने के लिए काफी है! भागे भला ना होएगा कहा धरोगे पांव। सिर सौंपो सीधे लड़ो काहे करो कुदाव।। कल रात रात और चाँद नहीं देखा होता, तो शायद आज खेलने नहीं जाता। रात 12 बजे सोया था। आज प्रयागराज काम के सिलसिले में निकलना भी था। सोचा कि चलो, आज बैडमिंटन रहने देते हैं। फिर रात में एक बार नींद खुली। सामने रात और चाँद का वीडियो याद आ रहा था। वह मन में नाचने लगा! आचार्य जी जो छाती ठोके न वीडियो में....... फिर सुबह 4:30 बजे का अलार्म लगा और उठकर तैयार हुआ 5.30 तक खेलने पहुंच गया। खेलकर लौटा तैयार हुआ, 8 काम के लिए निकल लिया। अब सोचिए, आचार्य जी की एक बात जीवन को किस तरह दिशा दे देती है! बात केवल बैडमिंटन खेलने की नहीं है। बात है जीवन के प्रति हमारे नज़रिए की। पहले मन बहाने बनाता था, लेकिन जब भीतर कुछ बदलता है, तो वही मन रास्ता भी निकालने लगता है। आचार्य जी का सान्निध्य केवल सत्र सुनने तक सीमित नहीं है। वह हमारे रोज़मर्रा के जीवन में उतरता है—हमारे निर्णयों में, हमारी दिनचर्या में और हमारे कर्मों में। यही तो है अध्यात्म का व्यावहारिक रूप।




















