
ASER -2024 के अनुसार यह तो दिखा दिया कि ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के सरकारी स्कूलों में 44 .8% बच्चे ही कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ पा रहे थे जबकि निजी स्कूलों में 59.3% का लेकिन एक रिपोर्ट यह भी निकालनी चाहिए कि भारत के ग्रामीण इलाके के जो सरकारी स्कूल है उनमें कौन से मां-बाप अपने बच्चों को भेजते हैं। केवल वही मां-बाप जो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं खुद कुपोषण का शिकार है और उनके बच्चे भी कुपोषण का शिकार होते हैं। मैं एक प्राथमिक अध्यापिका हूं हर रोज ऐसी समस्याओं से रूबरू हो रही हूं जहां पर बच्चा पढ़ने में कमजोर है तो माता-पिता को बुलाती हूं माता-पिता खुद बेचारे कमजोर हैं शारीरिक रूप से भी मानसिक रूप से भी और आर्थिक रूप से तो है ही। आज जिस मां को बुलाया वह खुद इतनी कमजोर शारीरिक रूप से, दो बच्चे हो चुके हैं तीसरे बच्चा 4 महीने का खून की कमी के कारण दिक्कत आ गई ।घर वाला दारू पीता है कमाता नहीं और मैं 10 पढ़ी लिखी है । बाहर जाकर काम करना चाहे तो उसको काम नहीं करने देता घर से बाहर निकल कर। उसकी मां ने बताया कि नियमित रूप से बच्चों को इसलिए स्कूल भेजती हूं कि घर पर खाने को कुछ नहीं है कम से कम स्कूल में खाना तो मिलेगा। जब से आचार्य जी की शिक्षाओं को सानिध्य मिला है तब से रास्ते थोड़े स्पष्ट हुए हैं तो जिन मां-बाप को मैं बुलाती हूं और उनकी समस्या नजर आती है तो समाधान तक उनको लेकर जाती हूं। कुछ दिन पहले भी एक ऐसी ही बहन को समझाया था जिसके दो बच्चियों थी और तीसरे बच्चे में उसकी काफी दिक्कत आ रही थी और डॉक्टरों ने मना कर दिया था क्योंकि दो बेटियां ऑपरेशन से हुई थी तो खून की कमी हो रही थी उसमें तो मैंने उसको समझाया तुझे कुछ हो गया तो तेरी बच्चियों को कौन पालेगा और घर वालों का दबाव था कि एक बेटा तो चाहिए ही, लेकिन अब समझाने के बाद उसको थोड़ी कुछ बातें समझ आ रही है।



















